सुभाष चंद्रा के दिवालियापन मामले को एनसीएलटी अध्यक्ष के पास वापस भेजा गया

ज़ी के संस्थापक सुभाष चंद्रा के दिवालियापन मामले में एक नया मोड़ आया है और नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल ने सोमवार को कहा कि लेनदारों को पेमेंट करने के चंद्रा के प्लान को मंज़ूरी देने के लिए कोई बहुमत वाला फ़ैसला नहीं हो पाया, क्योंकि तीसरे सदस्य की राय मूल बेंच के दोनों सदस्यों की राय से काफ़ी अलग थी।

बार एंड बेंच के अनुसार एनसीएलटी की बेंच, जिसमें ज्यूडिशियल मेंबर अशोक कुमार भारद्वाज और टेक्निकल मेंबर रीना सिन्हा पुरी शामिल थे, ने कहा कि इस स्टेज पर प्लान के बारे में कोई आदेश नहीं दिया जा सकता। इसलिए, अब इस विवाद को कंपनीज़ एक्ट, 2013 की धारा 419(5) के तहत एनसीएलटी अध्यक्ष के पास नए सिरे से भेजा गया है।

ट्रिब्यूनल ने कहा, “कुल मिलाकर, इस मामले में कोई बहुमत वाली राय नहीं बन पाई है। इसलिए, इस स्टेज पर कोई आदेश नहीं दिया जा सकता।”

यह स्पष्टीकरण तीसरे सदस्य नीलेश शर्मा द्वारा 25 अगस्त को दी गई 144 पेज की राय के बाद आया है, जिसे व्यापक रूप से चंद्रा के पेमेंट प्लान को मंज़ूरी देने वाला माना गया था। विवाद 3 सितंबर, 2025 को भारद्वाज और पुरी द्वारा दिए गए अलग-अलग फ़ैसलों से शुरू हुआ था।

भारद्वाज ने पेमेंट प्लान को मंज़ूरी दी। हालाँकि, उन्होंने इसके बाध्यकारी असर को केवल उन लेनदारों तक सीमित रखा जिन्होंने इसका समर्थन किया था। उन्होंने असहमति जताने वाले बैंकों और वित्तीय संस्थानों को अपना कर्ज़ वसूलने के लिए स्वतंत्र उपाय करने की अनुमति दी। पुरी ने प्लान को पूरी तरह से खारिज कर दिया। उन्होंने पाया कि पर्सनल इनसॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन प्रोसेस गंभीर प्रक्रियात्मक उल्लंघनों से प्रभावित थी। उन्होंने लेनदारों के वोट में चंद्रा से कथित तौर पर जुड़ी संस्थाओं को शामिल करने पर भी सवाल उठाए और रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल के कामकाज की आलोचना की।

इसके बाद मामले को तीसरे सदस्य के तौर पर शर्मा के सामने रखा गया। शर्मा ने प्लान को मंज़ूरी दी लेकिन असहमति जताने वाले लेनदारों के प्रति भारद्वाज के नज़रिए को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि धारा 115 मंज़ूर किए गए पेमेंट प्लान को चुनिंदा रूप से लागू करने की अनुमति नहीं देती है। उनके अनुसार, प्लान सभी लेनदारों पर बाध्यकारी होना चाहिए, चाहे उन्होंने इसके पक्ष में वोट दिया हो या विरोध में।

उन्होंने अनिल कुमार के ज़रिए 960 लोगों और सुनील जैन के ज़रिए 300 लोगों की ओर से दायर दावों को भी खारिज कर दिया। उन्होंने आदेश दिया कि संबंधित पेमेंट की रकम को बाकी योग्य लेनदारों के बीच फिर से बांटा जाए। ओरिजिनल बेंच के हालिया आदेश के मुताबिक, इन अंतरों ने प्लान के कामकाज को काफी हद तक बदल दिया।

एनसीएलटी ने कहा, “मूल आदेश में मेंबर (जे) ने जो कहा था—यानी सिर्फ़ सहमति देने वाले क्रेडिटर्स तक ही रीपेमेंट प्लान को सीमित करना और बैंकों/फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन्स/असहमति जताने वाले क्रेडिटर्स को अपना कर्ज़ वसूलने की छूट देना— वह तीसरे सदस्य के उस फ़ैसले से अलग है जिसमें बैंकों और फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन्स समेत सभी क्रेडिटर्स के दावों को खत्म करते हुए प्लान को मंज़ूरी दी गई थी।”

इसमें यह निष्कर्ष निकाला गया कि तीसरे सदस्य ने दोनों मूल विचारों से पूरी तरह सहमत होने के बजाय एक स्वतंत्र आदेश पारित किया था।

सही कानूनी स्थिति यह है कि 25 अगस्त की राय को वापस नहीं लिया गया है और न ही उसे पलटा गया है। यह कभी भी अंतिम मंजूरी आदेश का रूप नहीं ले पाया क्योंकि मूल बेंच ने अब पाया है कि इससे कोई कानूनी बहुमत नहीं बना था।

इस प्रकार, मामले को एनसीएलटी अध्यक्ष के पास वापस भेज दिया गया है। इसका मतलब यह भी होगा कि अपीलीय टिब्यूनल यानी एनसीएलएटी में अभी लंबित अपील अब निष्प्रभावी हो गई है।

एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस, कैनरा बैंक और यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया ने एनसीएलटी के उस फैसले को चुनौती देने का फैसला किया था, जिसमें चंद्रा के रिपेमेंट प्लान को मंजूरी दी गई थी। इस प्लान के तहत करीब ₹22,006.57 करोड़ के स्वीकार किए गए दावों के मुकाबले महज ₹6.25 करोड़ का भुगतान प्रस्तावित है।

पहले यह माना जा रहा था कि एनसीएलटी ने 25 अगस्त को सुभाष चंद्रा के रिपेमेंट प्लान को मंजूरी दी थी। आधिकारिक एनसीएलटी रिकॉर्ड में भी इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड बनाम डॉ. सुभाष चंद्रा मामले में 25 अगस्त 2026 को रिपेमेंट प्लान की मंजूरी का आदेश दर्ज है। योजना के मुताबिक चंद्रा को स्वीकार किए गए करीब ₹22,006.57 करोड़ के कर्जदाताओं के दावों के निपटारे के लिए लगभग ₹6.25 करोड़, जबकि करीब ₹25 लाख प्रक्रिया की लागत के लिए देने थे। इस तरह कुल रकम करीब ₹6.50 करोड़ बैठती है।

यह स्वीकार किए गए दावों का लगभग 0.03 फीसदी है, यानी कर्जदाताओं के लिए करीब 99.97 फीसदी का ‘हेयरकट’ दिखाई दे रहा था, जिसे विपक्ष ने “मुंडन” करार दिया था। हालांकि, मामले को एनसीएलटी अध्यक्ष के पास वापस भेजे जाने के बाद स्थति पूरी तरह बदल गयी है।

मामले के लिए अब एनसीएलटी ने पाँच सदस्यों वाली बेंच बनाई है जिसमें इसके अध्यक्ष अनुपिंदर सिंह ग्रेवाल शामिल हैं।

(जनचौक ब्यूरो)

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